धर्म का धंधा और उसका हिंसक स्वरुप
आज कल मिडिया में हिन्दू धर्म को लेकर शंकराचार्य के समर्थको और साईनाथ के उपासकों के बीच घमासान मचा हुआ है। जैसा की सर्विदित है शिर्डी के साईनाथ हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतिक रूप में काफी प्रसिद्ध हैं और उनकी पूजा अर्चना हिन्दू तौर तरीकों से हिन्दू और दूसरे सम्प्रदाय के माननेवाले लोग भी करते रहें हैं। पॉपुलर कल्चर में भी साईनाथ को लेकर कई फिल्में और गाने लिखे गए हैं।
लेकिन यह बात कट्टर ब्राह्मणवादियों और सामंती मानसिकता के हिंदुत्ववादियों को यह बात पसंद नहीं आई और एक तथाकथित धर्म संसद का आयोजन कर हिन्दू धर्म के सबसे बड़े ठेकेदारऔर मठाधीश शंकराचार्य ने साईं पर तुग़लकी फरमान सुना दी की उन्हें किसी हिन्दू मंदिर में स्थापित न किया जाय और जहाँ भी साईनाथ के मूर्ति किसी हिन्दू मंदिर में पाया जाय उसे अविलम्ब मंदिर से निकाल बहार किया जाय। हद तो तब हो गई जा मीडिया में हिन्दू साधु संतो का हिंसक व्यवहार दिखाया गया की कैसे शंकराचार्य समर्थक साधुओं ने अलग थलग पड़े साईं समर्थकों को अपमानित ही नहीं किया वरन उनके साथ मारपीट कर हिन्दू धर्म संसद के मंच से खदेड़ दिया गया।
कार्ल मार्क्स ने धर्म को जनता के लिए अफीम है, कहा है जो आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो काफी हद तक बड़ा प्रासंगिक ही लगता है। क्योंकि हिंदुस्तान से लेकर इराक और पाकिस्तान तक जिस तरह धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार चल रहा है, मुझे नास्तिक होने में ही ज्यादा सुकून है। भारत में देखा जाय तो आये दिन बाबा लोगों के बलत्कारी और दुराचारी होने की घटनाएँ लगातार सामने आ रहीं हैं।
धर्म का एक एक अर्थशास्त्र भी है। हमारे ही देश में देखा जाय तो यह बात एकदम जायज नजर आती है, क्योंकि लक्ष्मी के पूजा करने वाले बनिया /पूंजीपति लोग तो एक तरफ मालामाल होते रहते हैं लेकिन दूसरी तरफ करोड़ों लोग कंगाली और ग़ुरबत में जिंदगी बिताने को मजबूर हैं। गरीब लोगों को पंडा -पुजारी लोग मुर्ख बनाकर उनका आर्थिक शोषण कर अपना तोंद बढ़ाते रहते हैं। हिन्दू समाज बेहद ही अंधविस्वासी , कूपमंडूक और भेदभाव से भरा है जिसमे ही घुटन महसूस होता है। जो भी मंदिरों के आस पास गुजरा होगा उसे यह अवश्य ही पता होगा की लोगों ने पत्थर के सुन्दर मुर्तिओं के लिए बड़ा छोटे -बड़े मंदिर बना दिए हैं लेकिन इक्सवीं सदी के भारत में लाखों -करोड़ों लोग बेघर हैं और दिल्ली -मुंबई जैसे शहरों में फूट -पाथ पर सोने के लिए मजबूर हैं।
मेरा पक्का यकीं है की धर्म के आड़ में एक खास वर्ग है जो अपना फायदे का दुकान चला रहा है। लोगों को मुर्ख और मानसिक तौर पर गुलाम बनाये रखने का सबसे जबरदस्त हथियार धर्म ही है। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा की हमारे यहाँ स्कूल से ज्यादा मंदिर और मस्जिद और गिरजाघर हैं जो समाज में सदियों से अंधकार और हिंसा फैलाने का काम कर रहें हैं। न जाने कब मेहनतकश, गरीब और मजलूम तबका जागेगा और उन शोषण के संस्थान को उखाड़ फेकेगा। उसे दिन मानवता सही मायने में जागेगी और मानव सभ्यता सही मायने में एक कदम आगे बढ़ाएगी।
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