Saturday, August 30, 2014


परजीवी भागवत को यह बेचैनी क्यों ?

 

मैं कौन हूँ, मेरी पहचान  क्या?

मेरा धर्म क्या, मेरी राष्टीयता क्या

तू कौन होता है मेरी अस्मिता का निर्धारक ?

तू कैसा और किसका  ठेकदार?

मैंने तो तुझे चुना नहीं,

नहीं कोई संविदा हुई। 

 फिर तू क्यों है बेचैन ?

सबकी पहचान बताने को ?

सबों को हिन्दू बनाने को तुला,

कहीं तुझे ही तो कोई डर नहीं

की कहीं कोई तेरी जात न पूछ दे

 लुटेरे आर्यों का इतिहास न  पूछ दे ।

गर तुझे इतनी ही पड़ी है तो सुन--

 मैं सर्वहारा का रक्षक

हूँ मैं मजदूर मेहनतकश

जिसकी श्रम से बनी यह सभ्यता

और लड़ा जुल्मो सितम के खिलाफ ।

मेरा कोई धर्म नहीं,

मेरी पहचान है नास्तिकता

और मैं हूँ अंतराष्ट्रीयतवादी

तुझ जैसा कूपमंडूक नहीं ।  

शोषण मूलक समाज से त्रस्त,

विध्वंस करने को जुटा हूँ

नए समाज के निर्माण मे

खून पसीने सूखा रहा हूँ ।

है अगर तेरी हिम्मत

तो आ सामना कर

हंसिया और हथौड़ों का ,

परजीवी बनकर उपदेश न दे

शोषक है तू करोड़ो का ।  

संजय सर्वहारा, 30 अगस्त 2014

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