परजीवी भागवत को यह बेचैनी
क्यों ?
मैं कौन हूँ, मेरी पहचान क्या?
मेरा धर्म क्या, मेरी
राष्टीयता क्या?
तू कौन होता है मेरी अस्मिता का
निर्धारक ?
तू कैसा और किसका ठेकदार?
मैंने तो तुझे चुना नहीं,
नहीं कोई संविदा हुई।
फिर तू क्यों
है बेचैन ?
सबकी पहचान बताने को ?
सबों को हिन्दू बनाने को तुला,
कहीं तुझे ही तो कोई डर नहीं
की कहीं कोई तेरी जात न पूछ दे
लुटेरे आर्यों का इतिहास न पूछ दे ।
गर तुझे इतनी ही पड़ी है तो सुन--
मैं सर्वहारा का रक्षक
हूँ मैं मजदूर मेहनतकश
जिसकी श्रम से बनी यह सभ्यता
और लड़ा जुल्मो सितम के खिलाफ ।
मेरा कोई धर्म नहीं,
मेरी पहचान है नास्तिकता
और मैं हूँ अंतराष्ट्रीयतवादी
तुझ जैसा कूपमंडूक नहीं ।
शोषण मूलक समाज से त्रस्त,
विध्वंस करने को जुटा हूँ
नए समाज के निर्माण मे
खून पसीने सूखा रहा हूँ ।
है अगर तेरी हिम्मत
तो आ सामना कर
हंसिया और हथौड़ों का ,
परजीवी बनकर उपदेश न दे
शोषक है तू करोड़ो का ।
संजय सर्वहारा, 30 अगस्त 2014
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